मत्था मत टेको अनैतिकों के दरों पर..!

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-अरुण कुमार मयंक-
तब बौद्ध धर्म की विकृतियों से सम्पूर्ण भारत आह़त था. जीवन के सभी क्षेत्रों में पतन का दौर जारी था. समाज की नस-नाड़ी डूबती सी प्रतीत हो रही . चारों ओर हताशा और निराशा के भाव दृष्टिगोचर हो रहे थे. भारतीय समाज की ह्रदय-गति रूक जाने की आशंका से जनमानस आशंकित था. इस तिमिर जाल को काटने के के लिए शंकर को बाल्यावस्था में ही संन्यास ग्रहण करना पड़ा. खेलने-खाने एवं माता की गोद में मचलने की उम्र में ही बालक शंकर को दुरूह यात्रा पर निकल जाना पड़ा.
आसेतु हिमाचल घूमते रहे. गाँव-गाँव,गली-गली,डगर-डगर और नगर-नगर पदयात्रा,ज्ञानलाभ तथा शास्त्रार्थ चलते रहे. फिर भी विछिन्नता एवं विभिन्नता के पारावार में डूबते-उतराते तत्कालीन भारतीय समाज को एकात्मकता की वह रौशनी नहीं मिल पा रही थी, जिससे भारत-भूमि को धन्य होना था और बौद्ध धर्म की विकृतियों से निजात पाना संभव था. यहाँ तक क़ि खुद शंकर के मन से अँधेरे का छंटना बाकी था.
उन दिनों शंकर कांशी में थे. गंगा स्नान कर वे संध्या काल में संकीर्ण गली से होकर उपासना स्थल की ओर जा रहे थे. उसी गली में कथित चाण्डाल शराब के नशे में धुत्त खड़ा था. पूरी गली में उसने भगदड़ मचा रखी थी. शंकराचार्य ने उसे मार्ग छोड़ने को कहा. परन्तु राह देने की बजाय वह उनसे उलझ पड़ा और प्रश्नों की झड़ी लगा दी — तुम अपने आप को समझते क्या हो? हममें-तुममें अंतर क्या है? मेरे छूने मात्र से तुम अशुद्ध कैसे हो जाओगे? महाज्ञानी शंकराचार्य की जीभ एवं होंठ सैट गए. उनकी बोलती बंद हो गई. इतने पर भी उसने बस नहीं की तथा अगला सवाल दाग दिया — जरा यह तो बताओ क़ि नाली में दीखते सूर्य के प्रतिबिम्ब और गंगा में चमकते सूर्य के प्रतिबिम्ब दोनों में कौन श्रेष्ठ है? कौन शुद्ध है और कौन अशुद्ध है? बस! इसी अंतिम प्रश्न ने शंकराचार्य के सारे अहंकार को मिटा डाला. और वे कांशी की उस पतली गली में चाण्डाल के चरणों पर गिर पड़े. आदि शंकराचार्य ने भारतीय समाज को जिस वेदांती अद्वैतवाद का दर्शन दिया, उनकी वैचारिक पूर्णता इसी घटना के साथ हुई. इस दर्शन की किरणों ने अतीत की फूस और कचड़े की ढेरों को धधका दिया और भारतीय समाज में नवीन ऊर्जा का संचार किया.
तब भारत अंग्रेजी दासता के जुए तले कराह रहा था. भारत के राजनीतिक नक़्शे पर लाल रंग बढ़ता ही जा रहा था. लोगों की रोजी-रोटी के साधन छीनते जा रहे थे. ढाका के जुलाहों के अंगूठे कट चुके थे. सोने की चिड़िया के सुनहले पंख नोंच-नोंच कर इंग्लैंड के राजमुकुट और तख़्त में पिरोया जा रहा था. अफरा-तफरी के इसी माहौल में बहादुरशाह जफ़र एवं कुंवर सिंह जैसे बूढ़ों और लक्ष्मीबाई जैसी विधवा ने भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ तलवारें खींच ली. ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत तत्कालीन भारतीय समाज की आवश्यकता थी. प्रश्न जय-पराजय का नहीं, बल्कि मुकाबले का था. प्रश्न टक्कर लेने का था. लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उस जंग के लिए खुराक, नसीहत और रौशनी कहांसे मिली?
बैरकपुर छावनी का एक सिपाही मंगल पाण्डे नित्य की भांति शौच क्रिया से निवृत होकर एक लोटा पानी लेकर दांतून कर रहे थे. उसी समय वहां पर एक भंगी आया और मंगल पाण्डे के लोटे से पानी लेकर कुल्ला करने लगा. चन्दन टीकाधारी मंगल पाण्डे गुस्से से उबल उठे. डांट और गालियाँ जो भी दे सकते थे,उन्होंने सब दिया. लेकिन उस दिन भंगी को भी न जाने क्या हो गया? वह अपने को रोक न सका. उसने भी मंगल पाण्डे को खरी-खोटी सुना दी — बड़े भारी पंडित बनते हैं! मुझसे पानी छुआता है! इनकी पंडिताई चली जाती है! लेकिन अंग्रेजों की दी हुई गाय-सूअर की चर्बी वाली कारतूसों को दांतों से नोंचते वक्त पंडिताई कहाँ चली जाती है? बस! इसी एक घटना ने सोये सिंह को जगा दिया, जिसकी दहाड़ अभी तक सुनाई दे रही है. वस्तुतः भंगी ने मंगल पाण्डे को उस ज्ञान से लैस कर दिया, जिससे उत्पन्न चिंगारियों ने बारूद की ढेरों में आग लगा दी. भ्रमित भारतीय समाज को मार्ग मिल गया.
चम्पारण में नीलहे किसानों की व्यथा को राजकुमार शुक्ल ने गाँधी तक पहुँचाया. प्रारंभ में गांधीजी ने इसे गंभीरतापूर्वक नहीं लिया. पंडित शुक्ल को उन्होंने इसके लिए कलकत्ता आने का निर्देश दिया. और शुक्ल कलकत्ता भी जा पहुंचे. विवश होकर गांधीजी को चंपारण की ओर आना पड़ा. स्थिति राजकुमार शुक्ल के वर्णन से कहीं अधिक भयावह थी. नील उपजाने वाले किसानों की ह्रदयद्रावक व्यथा को उन्होंने सुना तथा सत्याग्रहरूपी हथियार का प्रयोग किया. चम्पारण के नीलहे किसानों के हित में किये गए सत्याग्रह के पहले तक खुद गांधी जी को अपने इस हथियार की ताकत का स्पष्ट इल्म नहीं था. चम्पारण के सत्याग्रह से गाँधी जी महात्मा हो गए और शोषित-पीड़ित किसानों-मजदूरों की आशा के केन्द्र. झोपड़ी की आह स्वंत्रता की चाह बन गई. शायद! गांधीजी चम्पारण के नीलहे किसानों के दरवाजे तक न पहुँचते तो सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह को कारगर राजनीतिक अस्त्र बनने में इतनी सुविधा न होती.
एक बार पुनः हवाला और घोटालों से आहत भारतीय समाज सहमा-सहमा सा है. लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हैं. जनतांत्रिक व्यवस्था के आगे सवालिया निशान खड़ा हो रहा है. हताशा और निराशा में कुछ लोग सैनिक शासन की भी वकालत करने लगे हैं. नेताओं की साख मिट चुकी है. आदर्श के अभाव में पार्टियों के बैन्नर एवं झंडे चीथड़े से लग रहे हैं. कोई गुमसुम बैठा है, तो कोई निर्लज्ज बनकर डींगे हांकने में लगा है. आस्था की मीनारें ध्वस्त हो चुकी हैं. भारतीय समाज मार्ग-दर्शन और नेतृत्व के लिए मुंह ताक रहा है. कहीं से तसल्ली नहीं मिल पा रही है. और हम अंध गली में जा फंसे हैं.
जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें शायद याद नहीं है क़ि — “कुछ बात ऎसी है क़ि हस्ती हमारी मिटती नहीं हमारी “. हमें धैर्य धारण करना होगा और नवीन मार्ग की तलाश के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे. भारतीय राष्ट्र कोई कृत्रिम घरौंदा नहीं है. भारी विविधताओं के बीच भी भारतीयों के दिलोंदिमाग में हजारों वर्षों से इसकी एक जीवन्त कल्पना और धारणा रही है. भारत की कल्पना को साकार करने के लिए दिल्ली, पाटलिपुत्र, आगरा और कन्नौज से बड़े-बड़े विजय अभियान आयोजित किये गए. भक्ति परंपरा के सूफियों एवं संतों ने इसी लालसा में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया. लेखकों ने अपनी लेखनी चलाई तथा कवियों ने इन भावनाओं को सहलाया और स्वर दिया. शंकर ने इसी उद्देश्य से चार तीर्थों की स्थापना की. समर्थ रामदास ने शिवाजी जैसे शिष्य की तलाश की और रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद में वह सब कुछ पाया, जिसकी तत्कालीन भारतीय समाज को आवश्यकता थी.
सर सैयद अहमद खां और महामना मालवीय के विद्या-प्रेम की दिशा भी यही थी. लोक गायकों की कण्ठों ने इन्हीं भावनाओं को अपनाया और लोक नर्तकों की पदचापों में भी यही स्वर गूँजे. रंगून की जेल में जब बहादुरशाह जफ़र यह कहते हैं — ” कब्र के लिए गज भर जमीं ना मिली कुए यार में ” तो उनका राष्ट्रप्रेम मूर्तिमान हो उठता है. यह सब कुछ हमारे राष्ट्र की चिन्तन-परम्परा में अभी भी सांस ले रहा है.
लोग नवीन मार्ग दर्शन हेतु आकुल-व्याकुल हैं. इसके लिए नए सिरे से कुछ करना होगा. वर्तमान नेतृत्व की ओर ताकने से कुछ होने वाला नहीं है. नेतृत्वकारियों की नवीन कतारें सजनी होंगी. भारत की आत्मा को पांच सितारा होटलों और राजमार्गों पर तलाशने की भूल ना करो! यह गंदी बस्तियों में है,मिटटी के ढूहों वाले टोलों में है. यह आज भी वही हैं,जहाँ बच्चों के नसीब में स्कूल जाना नहीं बदा है. और जिनके लिए रोज़ गम ही गम हैं,कभी खुशी के दिन न आये हैं और न आने की उम्मीदें हैं. जाओ जवानी में ही वृद्ध बनते बेरोजगारों के पास! उनकी व्यथा सुनने से ही भारत के भविष्य को चमकाने वाली रौशनी मिलेगी! ग़रीबों की गलियों में ही भारत के उज्ज्वल भविष्य के पन्ने बिखरे पड़े हैं! जाओ! उन्हें चुनो और सजाकर जिल्द बांधो!
मत्था मत टेको अनैतिकों के दरवाजे पर! दस्तक मत दो भ्रष्टाचारियों की किवाड़ों पर! वे तो देश को कंगाल बनाते हैं.वे ही तो हवालों और घोटालों के सृजनहार और रक्षक हैं. कम्पराडोरों से दुरभि सन्धि करके वे खुद कम्पराडोर बन गए हैं.मत टेको मत्था इनके दरों पर! जहाँ झोपड़ी है, जहाँ गरीबी है — मत्था वहां टेको! भारत के भविष्य के लिए मार्गदर्शन यहीं से मिलेगा.यहीं रौशनी है, यहीं शक्ति है.

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