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विश्व पुस्तक मेला के प्रति यह उदासीनता क्यों? : अनामी शरण बबल 

विश्व पुस्तक मेला को लेकर लगता है एक उदासीनता का माहौल भी समाज में यानी लेखक और पाठक वर्ग में पनपने लगा है शायद। तीनदिन मेला खत्म हो गया है पर मैं कुछ कारणों से नहीं जा सका।  आज जाने का पक्का इरादा था पर कई और काम के चलते मेले को ही नजरअंदाज करना पड़ा। आज को लेकर 8-10 मित्रों और लेखकों से फोन पर बात हुई थी पर सब बेकार। मैने दो एक लेखक दोस्तों से पूछा कि क्या आप मेले मे दिखेंगे? चतो कईयों ने दो टूक कहा नहीं यार आज मेका कोई वहां काम नहीं है। यानी संगोष्ठी या सेमिनार से बुलावा नहीं है।  हालांकि रोजाना 100-150 किताबों का लोकार्पण सामान्य सी बात है। माहौल भी साहित्य रसिको से भरा पूरा होता है। लोग मिलने जुलने का भी एक बडा साधन या माध्यम भी इसे मानते हैं । इसके बावजूद मेले की गरिमा और पाठकों से ज्यादा लेखकों और खरीददारों में भी मेले को लेकर भाव औसतसा हो गया है।  दिल्ली में आंमतौर पर गाहे बेगाहे हर साल चार पांच राष्ट्रीय पुस्तक मेला तो लग ही जाता है। लिहाजा कितावों का मेला हो और वही धिस्से पीट्टे प्रकाशक और वही किताबें ? एक लेखकऔर पाठक कितना रोमांच  कितना  उत्साह पैदा करे किताबों के लिए? वो भी इस मंदी के दौर में? किताबों का मतलब है कि केवल अपने लिए ही करीदना और यदि घर में जगह है तो बुक सेल्फ में घुस्सा कर कही रख देना। उस पर भी भारी है कि किताबों के लिए समय कौन निकाले ? समय रहे या बचे तब ना ?

पिछले 30-32 साल में जमान ाबदल गया, दिल्ली बदल गयी लोग बदल गए और मेला भी बदल गया। ( पहले किताबों का मेला होता था मगर अब तो दवा दारू फैशनसौंदर्यखिलौवे से लेकर धरकम बाबाओं की दुकानें भी इस मेले की शोभा बन गए है या इसकी शोभामें मिट्टी पलीद बन रहे है। मेला इतना मनभावन हो गया है कि सबकुछ का बाजारगरम रहता है और इनके बीच किताबों की चमक फीकी हो सी गयी है। पिछले 30-32 साल में इसके आयोजक भी वहीं है जो चकाचक करने बनाने और हमेशा कोई नया छीम भी खओजते है ंपर दिल्ली की पत्रकारिता इतनी बदल गयी है कि मेले को लेकररोजाना मेले पर फोकस करती खबरों से इउन्हें परहेज सा हो गया है. अंग्रेजी मीडिया को नकार भी दें तो अपन हिन्दी मीडिया के तमाम अखबार में किताब मेला का खबरों को देखकर लगता हगी नहीं है कि इसको लेकरअखबारो ने कोई प्लान किया हो। यह एक शर्मनाक पहलू है पत्रकारिता का कि इतना बड़ा मेला और हजारों लेखको पुस्तकों के प्रकाशन पर भी हिन्दी मीडिया गूंगा ही बना रहता है। रोजाना करीब 50 से ज्यादा सेमिनार होते हैं मगर क्या मजाल कि एक सेमिनार अखबार की शोभा बन जाए। यानीडिया की उदासीनता के चलते पाठकों को मेला के बारे में कोई उत्सुकता पैदा नहीं होती।

खासकर मुझे लगता है कि स्कूलों कॉलेजों को जोडने की भी एनबीटी द्वारा कोई पहल नहीं की जाती है। मेरे ख्याल से इतने बड़े आयोजन पर एनबीटी को यह प्रयास करना चाहिए था कि दिल्ली के लगभग 4000से अधिक सरकारी गैरसरकारी स्कूलों और करीब एक दर्जन यूनीवसिर्टी वालेी दिल्ली और इसके पडोसी बड़े शहरों में नोएडा गाजि.ाबाद फरीदाबाद और गुड़गांव के भी स्कूल इसमें  अपनी भागीदारी महसूस करे.

मेरे ख्याल से एबीटी का यह विशाल आयोजन एक विधवा विलाप हो गया है जिसमें शरीकतो लाखों लोग ( पाठकों दर्शकों की लगातार बढती आकंडा )इसमें शरीक भी होते हैं मगर अंतत इसमें नयपन के नाम पर पाते क्या है?  सही मायने में इसे किताब मेला की जगह लेखक पाठक मेला का भी नाम दें दे तो संभवत इसके नाम की सार्तकता बढ जाएगी और निसंदेह तब मेल जोल मिलन का यह मेला ज्यादा रोमांचकारी और सार्थक प्रतीत हो?

बहरहाल मेले के उपर सवाल उठाने का यह मेरा जुर्रत नहीं हैं मगर इसको जुर्रत कहने की बजाय इसको जरूरत बनाना जरूरी है। मेलो और प्रर्दशनियों से पटी दिल्ली को ही क्या इसका आयोजन स्थल बनाना जरूरी है? 40-45 साल बीत जाने के बादभी इतने विशाल देश में केवल दिल्ली ही एकमात्र आयोजन स्थल रहे। इसको देश के हरबड़्े शहर राज्य को आयोजन स्थल बनाया जाए तो शायद प्रकाशक भी यहदेककर हैरान रह जाए कि दिल्ली के प्रगति मैदान में जहां 75 फीसदी प्रकाशक मेला भर मक्खी मारते है।वे दूसरे शहों में ग्राहको की भीड़ को संभाल नहीं पाते।

हर साल भोपाल रायपुर जबलपुर बिलासपुर इंदौर इलाहाबाद बनारस गोरखपुर मेरठ आगरा लखनऊ  पटना रांची समेत नागपुर में लगने वाले पुस्तक मेलों में  ज्यादातर प्रकाशक हर साल  पाठकों केसैलाब को देखकर मुग्ध हो जाते है। मगर पिछले 25 साल से एनबीटी का एक ही बहाना कि दिल्ली जैसी सुविधा और एक साथ इतने बड़े बड़े हॉल कहीं औरउपलब्ध नहीं हो पाते। संभव है कि उनके तर्को में दम हो पर इस आयोजन को कभी बाहर ले जाने पर भी तो सोचे राज्य सरकारों से बात करे ताकि विश्व पुस्तक मेला को लेकर पूरे देश की निगाह रहे। देश भर में इसको लेकर उत्साह और उन्माद सा पैदा हो. तभी इस विश्व पुस्तक मेले के महत्व में चार चांद लगा सकते हैं नहीं तो दिल्ली के प्रगति मैदान में सिमटा यह मेला आने वाले समय में भले ही अपना महत्व ना खोए मगर अपने आकर्षण को तो गंवा ही बैठेगा।

(असंपा

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