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मातृत्व-सुख को नकारती आधुनिक महिलाएं

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हमारे समाज में वर्षों से यह धारणा रही है कि महिला की पूर्णता उसके मां बनने में ही है। मातृत्व का सुख किसी महिला के जीवन का सबसे बड़ा सुख माना जाता रहा है। जिस महिला की संतान नहीं होती, उसे अधूरी समझा जाता है और उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। पुराने जमाने में जब महिलाएं अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर हुआ करती थीं, समाज की सदियों पुरानी इस धारणा को गले लगाते हुए उन्होंने पुत्र प्राप्ति को ही जीवन का अंतिम उद्देश्य मान रखा था।

जैविक कारणों से जो महिला मां नहीं बन पाती थी, उसे समाज और परिवार में हर समय प्रताड़ना से गुजरना पड़ता था, लेकिन आज के समय में जब महिलाएं पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं और अपने बारे में निर्णय खुद लेने लगी हैं, तो कई महिलाओं का सदियों पुरानी इस धारणा के खिलाफ खड़ी होते हुए मां नहीं बनने का फैसला करना स्वाभाविक है। हालांकि आज आधुनिकता और फैशन के कारण भी कई महिलाएं निःसंतान रहने लगी हैं। कारण जो भी हो, यह सत्य है कि हाल के वर्षों में महिलाओं, खासकर कामकाजी महिलाओं में संतान न पैदा करने की प्रवृति तेजी से बढ़ी हैै। हाल के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि हमारे देश में 1.6 प्रतिशत महिलाएं अपनी मर्जी से संतान रहित हैं।

हमारे समाज में प्राचीन समय से ही महिलाओं को जबर्दस्ती विवाह के लिए राजी कराया जाता रहा है और तुरंत संतान पैदा करने के लिए विवश किया जाता रहा है। इससे महिलाओं की मनोस्थिति पर बहुत खराब प्रभाव पड़ता है। उन्हें संतान पैदा करने तथा बच्चे के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के बारे में सोचने का मौका दिया ही नहीं जाता है। उन्हें मजबूरन अनचाही संतान पैदा करनी पड़ती है और मजबूरन ही बच्चे के लालन-पालन के लिए खुद को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार करना पड़ता है। हर महिला की दिली तमन्ना होती है कि वह शादी के बाद कुछ दिनों तक नए परिवेश में खुद को ढाले और नए परिवेश का आनंद ले। जब वह संतान को जन्म देने और ठीक ढंग से उसके पालन-पोषण एवं हर दृष्टि से तैयार हो जाए, तभी बच्चे को जन्म दे। लेकिन शादी के एक-दो साल बाद तक किसी महिला के मां नहीं बनने पर उसे परिवार और पड़ासियों के ताने सुनने पड़ जाते हैं और उसे हर कोई बच्चा पैदा करने के लिए नसीहत देने लग जाता है। कुछ महिलाएं ऐसी नसीहतों से तंग आकर मां बनना स्वीकार कर लेती हैं, लेकिन जो महिलाएं इरादे की पक्की होती हैं, उन पर ऐसी नसीहतों का कोई असर नहीं होता। हालांकि परिवार वाले कुछ साल बाद जब उनके दूसरे बेटे-बेटियों के बच्चे हो जाते हैं और वे दादा-नाना बन जाते हैं, तो नसीहत देना छोड़ देते हैं, लेकिन समाज के लोग उनका पीछा नहीं छोड़ते।

आधुनिक समय में संतान न पैदा करने की कई महिलाओं की सोच के पीछे कई कारण हैं। सबसे मुख्य कारण तो यह है कि आज महिलाओं में प्रतिद्वंदिता व महत्वाकांक्षा की भावना पैदा हो गई है। यह प्रतिद्वंदिता आमतौर पर पति और सहकर्मियों से होती है। वे सोचती हैं कि संतान पैदा करने से उनके कई साल बर्बाद हो जाएंगे, उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ सकती है या लंबी छुट्टी लेनी पड़ सकती है, जबकि पुरुष पर इन बातों का कोई खास असर नहीं पड़ता। यही नहीं, संतान पैदा होने के बाद महिलाओं की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है, खासकर कामकाजी महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ जाती है। उन्हें संतान और काम के बीच सामंजस्य बिठाना पड़ता है और अपनी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है। इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वे अक्सर तनाव में रहती हैं और अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाती हैं।

मानसिक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर वैसी स्थिति में अधिक खराब असर पड़ता है, जब कोई महिला मां बनना नहीं चाहती है और उसका पति उसे मां बनने के लिए मजबूर कर देता है। ऐसी स्थिति में वह महिला बच्चे पर अधिक ध्यान नहीं देती, साथ ही पति के साथ भी उसके संबंध खराब हो जाते हैं।

अब महिलाएं समझने लगी हैं कि मां बनने का अर्थ सिर्फ संतान पैदा करना ही नहीं, बल्कि संतान की उचित ढंग से परवरिश करना, अच्छा भोजन और शिक्षा उपलब्ध कराना भी है। हालांकि कुछ महिलाएं संतान तो पैदा कर लेती हैं, लेकिन अपनी दूसरी जिम्मेदारियों के कारण बच्चे को आयाओं के भरोसे छोड़ देती हैं, जिसका बच्चे पर बहुत खराब असर पड़ता है। इसलिए जब कोई महिला संतान पैदा करने का निर्णय ले लेती है, तो उसकी पहली प्राथमिकता संतान ही होनी चाहिए, जो महिलाएं यह जानती हैं कि वे बच्चे को अधिक समय नहीं दे पाएंगी, उन्हें संतान पैदा करने का विचार त्याग देना चाहिए।

मनोचिकित्सक रूप बरार का भी मानना है कि एक हद तक आर्थिक निर्भरता हासिल करने वाली महिलाएं अब संतान नहीं पैदा करने का निर्णय लेने में समर्थ होने लगी हैं। उनकी राय में जनसंचार माध्यमों के जरिये पूरी दुनिया से साक्षात्कार करने तथा उनमें जागरुकता आने के कारण अब पढ़ी-लिखी महिलाएं यह समझ चुकी हैं कि मां बनने का अर्थ केवल बच्चे पैदा करना ही नहीं है, बल्कि उनके सही पालन-पोषण की जिम्मेदारियां बखूबी वहन करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाएं अब इन जिम्मेदारियों से बचने के लिए मां बनने से कतराने लगी हैं, बल्कि अब वे अपनी इन जिम्मेदारियों को गंभीरता से समझते हुए अधिक व्यवहारिक होने लगी हैं। जो पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिलाएं यह समझती हैं कि वे अपने बच्चे को पालन-पोषण के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाएंगी, वे मां नहीं बनने का फैसला करती हैं। लेकिन, कम पढ़ी-लिखी महिलाएं इस मामले में अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। इसका मुख्य कारण उनमें जागरुकता का अभाव तथा आत्मविश्वास की कमी है।

मनोचिकित्सक डा. राजीव आनंद के अनुसार, विवाह ऐसी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था है, जिसके जरिये पति-पत्नी परिपक्व होते हैं और एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। मां-बाप बनना इस प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है, लेकिन इस प्रक्रिया में अगर किसी एक व्यक्ति-पति या पत्नी की महत्वाकांक्षा अथवा आत्मसंतुष्टि बाधित होती है या कुचली जाती है, तो यह गलत है। इसलिए मां-बाप बनने का फैसला दोनों पति-पत्नी की संपूर्ण सहमति के आधार पर होना चाहिए, तभी बच्चे का पालन-पोषण आदर्श तरीके से हो सकेगा। अगर पति या पत्नी बच्चे पैदा करने के लिए पूरे मन से सहमत नहीं हों, तो जाहिर है कि इसका बच्चे के व्यक्तित्व के विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

 

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