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विश्व पुस्तक मेला के प्रति यह उदासीनता क्यों? : अनामी शरण बबल 

विश्व पुस्तक मेला को लेकर लगता है एक उदासीनता का माहौल भी समाज में यानी लेखक और पाठक वर्ग में पनपने लगा है शायद। तीनदिन मेला खत्म हो गया है पर मैं कुछ कारणों से नहीं जा सका।  आज जाने का पक्का इरादा था पर कई और काम के चलते मेले को ही नजरअंदाज करना पड़ा। आज को लेकर 8-10 मित्रों और लेखकों से फोन पर बात हुई थी पर सब बेकार। मैने दो एक लेखक दोस्तों से पूछा कि क्या आप मेले मे दिखेंगे? चतो कईयों ने दो टूक कहा नहीं यार आज मेका कोई वहां काम नहीं है। यानी संगोष्ठी या सेमिनार से बुलावा नहीं है।  हालांकि रोजाना 100-150 किताबों का लोकार्पण सामान्य सी बात है। माहौल भी साहित्य रसिको से भरा पूरा होता है। लोग मिलने जुलने का भी एक बडा साधन या माध्यम भी इसे मानते हैं । इसके बावजूद मेले की गरिमा और पाठकों से ज्यादा लेखकों और खरीददारों में भी मेले को लेकर भाव औसतसा हो गया है।

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यह है डिजिटल भारत। अब अगर मेट्रो कार्ड 500 रूपए का चार्ज कराएंगे तो देना होगा 504 रूपए।

ऐसे कैसे भारत बनेगा कैशलेस, जब हर चीज में मांगा जाएगा टैक्स

भारत को कैशलेस इकोनॉमी बनाने का जो सपना पीएम मोदी ने देखा है, वह शायद साकार न हो सके। दिल्ली के एक आम आदमी की आप बीती सुनकर कुछ ऐसा ही लगता है।

नई दिल्ली। पीएम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करने के बाद लोगों से कैशलेस ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने की मांग की थी। पीएम ने लोगों को कैशलेस ट्रांजैक्शन करने को तो कह दिया, लेकिन ये नहीं बताया कि हर बार ऐसी ट्रांजैक्शन करने पर आपको कुछ अतिरिक्त पैसे टैक्स के तौर पर चुकाने होंगे। दिल्ली मेट्रो में आने जाने वाले लोगों को भी इस टैक्स की मार झेलनी पड़ रही है। यूं तो लोग कैश देकर अपना मेट्रो कार्ड रिचार्ज करा लिया करते थे, लेकिन अब जब वह अपने डेबिट या क्रेडिट कार्ड के जरिए अपने मेट्रो कार्ड को रिचार्ज करते हैं तो उन्हें कुछ टैक्स देना पड़ रहा है।
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ऐसे में एक सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिर नोटबंदी किस कालेधन पर रोक लगाने के लिए की गई थी। वो कालाधन जो अमीरों के पास है या फिर वो पैसे जो आम जनता अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए खर्च कर रही है। नोटबंदी के फैसले से उन लोगों को भले ही कोई नुकसान हुआ हो या न हुआ हो जिनके पास करोड़ों रुपयों का कालाधन है, लेकिन आम आदमी की जरूरत अब पहले से महंगी हो गई है। जो लोग पीएम मोदी की बात मानकर कैशलेस ट्रांजैक्शन की ओर बढ़ रहे हैं उन्हें या तो अपनी जरूरत की चीजों के लिए अधिक खर्च करना पड़ रहा है या फिर अपनी जरूरतें ही कम करनी पड़ रही हैं, क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से अब वह चीज महंगी हो चुकी है।
कुछ ऐसा ही हाल है दिल्ली में रहने वाले एक शख्स सचिन लखनवी का। इन्होंने गुरुवार की शाम को मेट्रो कार्ड को 500 रुपए से रिचार्ज कराया था। और दिन इस रिचार्ज के लिए उन्हें 500 रुपए ही देने पड़ते थे, लेकिन इस बार उन्होंने पीएम मोदी के कैशलेस इकोनॉमी के सपने में सहयोग करने की सोची और अपने डेबिट कार्ड से भुगतान किया। जब उन्हें रसीद मिली तो वह यह देखकर चौंक गए कि आखिर 504 रुपए क्यों काटे गए हैं, जबकि उन्होंने रिचार्ज तो 500 रुपए का ही कराया था। पूछने पर पता चला कि ये टैक्स है जो हर उस शख्स को देना होगा जो कार्ड से भुगतान करेगा। उन्होंने फेसबुक पर उस रसीद की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए सरकार से एक अपील भी की है। उन्होंने लिखा है- ‘पूरी सैलरी पर 50 फीसदी टैक्स ले लो… बस सोशल सिक्योरिटी दे दो… डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स बंद करो’

भले ही 4 रुपए छोटी रकम है, लेकिन हर जरूरत में कार्ड का इस्तेमाल करने पर 4-4 रुपए मिलकर काफी बड़ी रकम बन जाएंगे, जो एक आम आदमी के बजट को बिगाड़ देंगे। ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर कोई कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा क्यों दे, जबकि उसे पता है कि इसका भार उसी की जेब पर पड़ेगा। इस तरह से कैशलेस इकोनॉमी का सपना देखना भी बेकार साबित होता दिख रहा है। इस तरह के टैक्स से बचने के लिए हर शख्स अपनी जरूरतों के लिए कार्ड के बजाए कैश का इस्तेमाल करना पसंद करेगा और कैशलेस इकोनॉमी एक सपना ही बनकर रह जाएगा।

  • ANUJ KUMAR MAURYA

आईए, करीना-सैफ के पुत्र तैमूर का स्वागत करें : राम पुनियानी

 

Kareena Kapoor & Saif Ali Khan with their Son Taimoor
Kareena Kapoor & Saif Ali Khan with their Son Taimoor

हमारे समाज पर सांप्रदायिक मानसिकता की जकड़न भयावह है। हमारा समाज इतिहास को राजाओं के धर्म के चश्मे से देखता है। सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास की चुनिंदा घटनाओं और व्यक्तित्वों का इस्तेमाल, इतिहास का अपना संस्करण गढ़ने के लिए कर रही है। यही विचारधारा दोनों समुदायों के बीच घृणा के बीज बो रही है। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाते हैं तो हिन्दू संप्रदायवादी हमसे कहते हैं कि मुसलमानों से नफरत करो। इसी घृणा से उपजती है सांप्रदायिक हिंसा, जो कि अधिकांश मामलों में सोची-समझी साजिश के तहत भड़काई जाती है। इस हिंसा में मासूम लोग मारे जाते हैं और समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है, जिसका लाभ सांप्रदायिक ताकतें उठाती हैं। सांप्रदायिक शक्तियां अंतर्धामिक विवाहों और ऐसे सांस्कृतिक आचरणों की विरोधी हैं, जो विभिन्न धर्मों के लोगों को एक करते हैं। इन दिनों मुस्लिम पुरूष और हिन्दू महिला के बीच विवाह को ‘लव जिहाद’ कहा जाता है और यहां तक कि इस तरह के विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

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आधुनिकता ज़रूरी या संस्कृति : हृदय गुप्ता

woman-praying-आधुनिक दौर टेक्नोलॉजी व तेज़ी का युग है और पूरा विश्व इसके साथ चलना चाहता है और बेशक चल भी रहा है | भारत एक ऐसा देश है जो विभिन्न संस्कृति, धर्म और जीवनशैलियों से मिल कर बना है जो निःसंदेह ही इसकी पहचान भी है | हमारे देश में ये चर्चा हमेशा से ही रही है कि किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी संस्कृति ज़रूरी है या आधुनिकता | इस बात में कोई दोराहे नहीं की बदलाव प्रक्रति का नियम है सुर इसके साथ चलना बेहतर ही नहीं बल्कि ज़रूरी भी है | पर उसी समय अपने संस्कारों और परम्परा का भी सम्मान करना अनिवार्य है, तो इस दौर के व्यक्ति को क्या करना चाहियें? समय के साथ बदल जाना चाहिए या अपनी संस्कृति से जुड़े रहना चाहिए?

गौरतलब है कि किसी भी एक खेमे में रह जाना उस व्यक्ति विशेष के लिए लाभदायक नहीं होगा, ऐसे में दोनों का कुछ अनिवार्यित हिस्सा ले लिया जाए तो न केवल यह सबसे बेहतर विकल्प होगा बल्कि समाज के भी विकास में रुकावट नहीं बनेगा | अर्थात् पूर्ण रूप से आधुनिक हो जाना व संस्कारों को भूल जाना व्यक्ति को समय के साथ चलने में मदद तो करता है पर भारत जैसे देख में उसे बाकी समाज से दूर कर देता है और यह आज कल के युवाओं में आम तौर पर देखा भी जाता है | इसी प्रकार अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़े रह कर किसी भी बदलाव को न अपनाने वाला व्यलती भी समाज से मेल नहीं खाता और यह अक्सर देखा जाता है कि पढ़े लिखे व आधुनिक लोग इस तरह के लोगों के साथ ज्यादा जुड़ नहीं पाते | अब ज़रूरी हो जाता है की आप आधुनिक भी हो और अपनी परंपरा से भी जुड़े रहे | दोनों का मिश्रण ले कर चलना सबके साथ मेल खाने में भी मदद करता है और आपकी पहचान भी मज़बूत बनता है |

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सर्विस चार्ज का ऑप्शन दे सरकार ने फंसा दिया

रेस्टोरेंट में डिनर के बाद आपको इंतजार फूड बिल का रहता है. बिल आते ही आपकी नजर फूड बिल पर लगे टैक्स और चार्जेज पर पड़ती है. फूड बिल में आमतौर पर तीन तरह के चार्ज लगे रहते हैं. पहला सर्विस टैक्स, दूसरा सर्विस चार्ज और तीसरा वैल्यू ऐडेड टैक्स. इन तीनों चार्जेज पर केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि फूड बिल पर लगे सर्विस चार्ज का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है. हालांकि जो रेस्टोरेंट इस चार्ज को ले रहे हैं वह ग्राहक को मजबूर करके नहीं ले सकते.
आइए, देखें फूड बिल पर लगे सभी टैक्स और चार्ज

1. सर्विस टैक्स: फूड बिल पर सर्विस टैक्स केन्द्र सरकार वसूलती है. यह टैक्स रेस्टोरेंट द्वारा दी जा रही सेवाओं पर लगाया जाता है. टैक्स नियम के मुताबिक यह टैक्स रेस्टोरेंट द्वारा फूड और बेवरेज को छोड़कर दी जा रही अन्य सेवाओं पर लगता है. मसलन रेस्टोरेंट में एयरकंडीशनर, वेटर, एंटरटेनमेंट इत्यादी जैसी सेवाओं पर इस टैक्स को लगाया जाता है. मौजूदा समय में देशभर में 14 फीसदी सर्विस टैक्स लगता है. इसके अलावा फूड बिल पर 0.5 फीसदी कृषि कल्याण टैक्स और 0.5 फीसदी स्वच्छ भारत टैक्स लगता है. यह टैक्स सभी रेस्टोरेंट को सरकार के पास जमा कराना होता है और इसलिए रेस्टोरेंट इस टैक्स को आपसे वसूलकर आगे बढ़ा देती हैं.
2. वैल्यू ऐडेड टैक्स: यह टैक्स राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित होता है लिहाजा इसकी दर प्रत्येक राज्य में अलग-अलग रहती है. इस टैक्स को रेस्टोरेंट द्वारा दिए जा रहे फूड और बेवरेज पर लगाया जाता है. टैक्स नियम के मुताबिक यह टैक्स सिर्फ रेस्टोरेंट में तैयार किए गए खाने और बेवरेज पर लगाया जा सकता है. लिहाजा, इस टैक्स के दायरे में रेस्टोरेंट में सर्व की गई कोल्ड ड्रिंक, शराब, बिसलेरी, इत्यादी पर नहीं लगता क्योंकि ये उत्पाद रेस्टोरेंट के बाहर बनते हैं. अलग-अलग राज्यों में 5-20 फीसदी तक वैल्यू ऐडेड टैक्स लगाया जाता है. यह टैक्स फूड बिल में सर्विस चार्ज को जोड़ते हुए लगाया जाता है और इसमें सर्विस टैक्स को शामिल नहीं किया जाता.

3. सर्विस चार्ज: अब तीसरा और सबसे विवादित चार्ज सर्विस चार्ज है. इस चार्ज का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है. हालांकि इसे एक ग्लोबल प्रैक्टिस के तहत रेस्टोरेंट फूड बिल में शामिल करते हैं. इस चार्ज का आशय सिर्फ रेस्टोरेंट में वेटर के टिप के तौर पर होता है. आमतौर पर इस चार्ज से एकत्रित पूरा पैसा रेस्टोरेंट में वेटर, मैनेजर और क्लीनिंग स्टाफ में बांट दिया जाता है. हालांकि रेस्टोरेंट का यह सपोर्ट स्टाफ मासिक सैलरी पर रहता है लेकिन रेस्टोरेंट इस चार्ज को बतौर पर्क और बोनस अपने कर्मचारियों में बांट देते हैं. गौरतलब है कि कंज्यूमर प्रोटेक्शन विभाग को लगातार इस आशय शिकायत भी मिलती रही है कि रेस्टोरेंट इस सर्विस चार्ज से एकत्रित हुए पैसे के बड़े हिस्से का इस्तेमाल रेस्टोरेंट के रखरखाव के लिए करता है. आपके फूड बिल में इस चार्ज के जुड़ने के बाद रेस्टोरेंट में आपको वेटर को टिप देने की जरूरत नहीं पड़ती. लिहाजा, कई रेस्टोरेंट अपने मेनू कार्ड में साफ-साफ लिखते हैं कि फूड बिल पर सर्विस चार्ज लगाया जाएगा.

एक्सपर्ट की राय: सर्विस चार्ज पर उठे विवाद पर इंडिया टुडे संपादक अंशुमान तिवारी का मानना है कि मौजूदा विवाद को खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार को अपना साफ पक्ष रखना चाहिए था. सरकार या तो सर्विस चार्ज को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर सकती थी अथवा इसे कानून के दायरे में ला सकती थी. लेकिन, सोमवार को कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय की तरफ से जारी एडवाइजरी से महज विवाद पैदा हुआ है.
वहीं नैशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन की तरफ से मंत्रालय द्वारा जारी एडवाइजरी का विरोध किया गया है. एसोसिएशन के अध्यक्ष रियाज अमलानी का मानना है कि यह एक ग्लोबल प्रैक्टिस है जिसके तहत रेस्टोरेंट में जाने वाले लोग सर्विस से खुश होकर वेटर को टिप देते हैं. अमलानी ने कहा कि जब तक मेन्यू में सेवा शुल्क को मुख्य रूप से दर्ज किया गया है, इसे अनुचित और खराब व्यवहार नहीं कहा जा सकता.

टैक्स सलाहकार ऐ.के. बंसल के मुताबिक केन्द्र सरकार को यह फैसला लेने की जरूरत है कि फूड बिल पर सर्विस चार्ज लगाना कानूनी अथवा गैरकानूनी है. वहीं उसे उपभोक्ता संरक्षण नियमों को मजबूत करने की भी जरूरत है जिससे ग्राहकों को रेस्टोरेंट द्वारा अधिक वसूली के खिलाफ शिकायत करने की प्रक्रिया को आसान किया जा सके.

फेडरेशन आफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशंस आफ इंडिया एफएचआरएआई का कहना है कि वह इस मुद्दे को उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के समक्ष उठाएगी. एफएचआरएआई में चेयरमैन विधि मामलों की उप समिति प्रदीप शेट्टी ने कहा, इससे भ्रम व विवाद होगा.

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सपा कुनबे में नहीं हुई अभी सुलह, अपने खेमे से बातचीत कर रहे हैं मुलायम सिंह यादव

बाप-बेटों के बीच बंट चुकी समाजवादी पार्टी की लड़ाई अब ‘साइकिल’ के लिए दिल्ली में जारी है तो लखनऊ में सुलह की कोशिशें भी होती दिख रही हैं. पार्टी चिन्ह साइकिल किसका होगा इसके लिए मुलायम सिंह के बाद अखिलेश खेमा भी मंगलवार को चुनाव आयोग से मिला और साइकिल चुनाव चिन्ह पर दावा ठोका. रामगोपाल यादव ने बताया कि चुनाव आयोग से उन्होंने कहा है कि जहां अखिलेश हैं वहीं असली सपा है. 90 फीसदी विधायक हमारे साथ हैं और इसलिए पार्टी पर हमारा हक है.

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क्या है पेटीएम की सच्चाई

alibaba-paytm.web– गिरीश मालवीय 

एक बात तो आप सभी मानेंगे कि नोटबंदी से सबसे अधिक फायदा पेटीएम को ही पुहंचा है…….पेटीएम से रोजाना 70 लाख सौदे होने लगे हैं जिनका मूल्य करीब 120 करोड़ रपये तक पहुंच गया है,पेटीएम हर ट्रांसिक्शन मे मोटा कमीशन वसूल रही हैं……सौदों में आई भारी तेजी से कंपनी को अपने पांच अरब डॉलर मूल्य की सकल उत्पाद बिक्री (जीएमवी) लक्ष्य को तय समय से चार महीने पहले ही प्राप्त कर लिया है………
पर पेटीएम कंपनी है क्या?………

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