चिकित्सा के क्षेत्र में कारपोरेटाइजेशन के कारण डाक्टर हुये हैं मनीमाइंडेड – डा. युवराज कुमार

Dr, yuvraj - 1डा. युवराज कुमार ने कम उम्र में ही अपने को अस्थि शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में स्थापित कर लिया है। बचपन में ही अपने पिता को खो देने और तमाम तरह की मुश्किलात झेलने के बावजूद उन्होंने डॉक्टर बन कर अपनी मां के सपने को पूरा किया और अब समाज सेवा के जरिये अपने खुद के सपने को पूरा करना चाहते हैं। फर्स्ट न्यूज लाइव के साथ विशेष साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उनका सपना आर्थराइटिस के सभी रोगियों का इलाज करना है।

आपको डॉक्टर बनने की प्रेरणा कहां से मिली?

मेरे नाना बिहारशरीफ (नालंदा) में हकीम थे। वह बालो डॉक्टर के नाम से जाने जाते थे। उनका नाम डा. हंसराज था। इस तरह मेरी मां अप्रशिक्षित डॉक्टर परिवार से थी और वह मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थीं। चूंकि मेरे पिता की मृत्यु बहुत जल्द हो गयी थी इसलिए मैं डाक्टर बनकर अपनी मां का सपना पूरा करना चाहता था और उनके सपने को मैंने पूरा किया।
आपका बचपन काफी मुश्किलों के दौर से गुजरा, इसके बाद भी आप चिकित्सा के क्षेत्र में आने में सफल रहे। आखिर इस क्षेत्र में कैसे आये?
मैं एक व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखता हूं। हमलोग विध्यांचल में बिरजापुर में रहते थे। जब मैं सिर्फ 5 साल का था तो मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गयी। मेरा तो जैसे सब-कुछ खत्म हो गया था। लेकिन मेरे बड़े भाई ने गॉडफादर की भूमिका निभायी। वह मेरे पिता समान हैं। उन्होंने मुझे पटना जाकर पढ़ाई करने की सलाह दी जहां मेरे रिश्तेदार रहते थे। मैं पटना चला गया और 100 साल पुराने सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। वह स्कूल बहुत प्रसिद्ध था। उस स्कूल से भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद के अलावा कई जानी-मानी हस्तियां ने शिक्षा हासिल की थी। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण मुझे सरकारी स्कूल में ही दाखिला लेना पड़ा। उसी स्कूल से मैंने 1987 में मैट्रिक पास किया और उसके बाद मगध विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट किया। उसके बाद मैंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयार शुरू कर दी। मेडिकल में मेरा चयन हो गया और मैंने 1993 में पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। मैंने कॉलेज में पहले दिन से ही कड़ी मेहनत की क्योंकि चिकित्सक बन कर समाज की सेवा करना मेरा लक्ष्य था। मैंने पोस्ट ग्रैजुएट की परीक्षा दी और अपने कॉलेज में अच्छे नंबरों से मेरा सलेक्शन हो गया। मैंने 2004 में बीएमसीएच पटना से एमएस आर्थोपेडिक्स पास किया। मुझे स्पाइनल सर्जरी में काफी रुचि थी इसलिए एम एस करने के बाद मैं मुम्बई चला गया जहां बॉम्बे हॉस्पिटल ज्वाइन किया और सौभाग्य से मुझे स्पाइन सर्जरी में डा. समीर दलवी का यूनिट दिया गया जो कि भारत और विदेशों में भी स्पाइन सर्जरी विशेषज्ञों में से एक हैं। मैंने 2005 से 2006 तक दो सालों तक स्पाइन सर्जरी विभाग में उनके साथ काम किया। उसके बाद स्पाइन सर्जरी को खत्म करने के बाद मैंने अपना स्पाइनल फलोशिप किया जिसमें डा. समीर दलवी ने मेरी काफी मदद की। हालांकि स्पाइनल फेलोशिप के बाद मैं 2006 के मध्य में लंदन में इंग्लैंड चला गया जहां मैंने दो अस्पतालों रॉयल नेशनल आर्थोपेडिक हॉस्पिटल स्टैमन और रसेलस्क्वायर में जीओएसएच ग्रिड ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल से छह महीने के लिए स्पाइनल फेलोशिप किया। स्पाइन फेलोशिप करने के बाद मैं भारत आ गया। यहां दिल्ली में दिसंबर 2006 में मैंने अपोलो हॉस्पिटल ज्वाइन किया। यहां मुझे ज्वाइंट रिप्लेसमेंट यूनिट मिला और 2006 से ही मैंने ज्वाइंट रिप्लेसमेंट करना शुरू कर दिया। मैंने ज्वाइंट रिप्लेसमेंट में असिस्टेंट के तौर पर कार्य करना शुरू किया। मैंने कुछ दिन तकरीब 24 घंटे तक काम किया। मैंने करीब साढ़े तीन साल तक अपोलो अस्पताल में ज्वाइंट रिप्लेसमेंट तथा आर्थोस्कोपी में काम किया। इस तरह मेरा सर्जिकल कौशल स्पाइनल से ज्वाइंट रिप्लेसमेंट और उससे आर्थोस्कोपी में परिवर्तित हो गया। लेकिन इस ज्वाइंट रिप्लेसमेंट या आर्थोस्कोपी के इस समय के बीच ही मैंने स्प्लिट कॉपरनिकोल का भी इस्तेमाल किया। इसलिए मैंने ज्वाइंट रिप्लेसमेंट में काफी गंभीरता से काम किया। मैं ऑपरेटिंग केयर, पोस्ट ऑपरेटिंग केयर, हाउस में काफी उत्सुक था। इसलिए साढ़े तीन साल के बाद मेरा प्रमोशन जूनियर कंसल्टेंट और उसके बाद असोसिएट कंसल्टेंट और उसके बाद अटेंडिंग कंसल्टेंट में हो गया। अभी मैं नयी दिल्ली के सरिता विहार स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में अटेंडिंग कंसल्टेंट हूं और नोएडा अपोलो अस्पताल में इंडिपेंडेंट कंसल्टेंट हूं। उसके बाद मेरा चयन फरीदाबाद में एशियन इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में हो गया और मैंने मई 2010 में आर्थोपेडिक्स विभाग में कंसल्टेंट के तौर पर ज्वाइन किया। इस समय मैं एशियन इंस्टीच्यूट आफ मेडिकल साइंसेस में आर्थोपेडिक्स विभाग के अध्यक्ष के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां संभाल रहा हूं।

चिकित्सक सरकारी क्षेत्र में रह कर अधिक से अधिक मरीजों का इलाज कर सकता है, क्योंकि सरकारी क्षेत्र में चिकित्सक को पैसे की चिंता नहीं करनी होती है। ऐसे में आपने निजी क्षेत्र में आने का फैसला क्यों किया?

शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात स्पष्ट थी कि मुझे समाज की सेवा करनी है लेकिन सरकारी सेटअप के साथ काम करना मेरे लिए संभव नहीं था क्यांकि मैंने सरकारी सेटअप में कायम परिस्थितियों को देखा था। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पीएचसी डॉक्टरों और कई अन्य डॉक्टरों से मुझे पता चलता था कि वे समाज की सेवा नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वहां तकनीकों एवं आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में मरीजों का सही तरह से इलाज करना मुश्किल होता है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में लालफीताशाही और कामकाज का सरकारी ढर्रे एक चिकित्सक को सही मायने में समाज सेवा करने से रोकते है। यही सोचकर मैं निजी क्षेत्र में आ गया। हालांकि यहां मुझे मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सरकारी सेटअप में आप बगैर मेहनत भी सरवाइव कर सकते हैं लेकिन निजी क्षेत्र में आपको कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और अपने आपको चिकित्सा विज्ञान में हो रही प्रगति से अपडेट रखना होता है।
आपने आर्थोपेडिक्स का चुनाव ही क्यों किया। अन्य पेशों की तुलना में चिकित्सा के पेशे को कैसे अलग मानते हैं?
हालांकि मुझे रेडियो डायग्नोसिस मिल रहा था, लेकिन मैंने आर्थोपेडिक्स का चुनाव किया। मुझे लगा कि रेडियो डायग्नोसिस डॉक्टर की पसंद से अलग है और रेडियो डायग्नोसिस रोगी से अपेक्षाकृत अधिक दूर है। यह रोगी से सीधा जुड़ा हुआ नहीं है। जब हम रोगियों का इलाज करते हैं तो वे हमें जो आदर देते हैं वह बहुत महत्वपूर्ण होता है और रोगी की तरफ से पारितोषिक होता है और यह बहुत प्रेरक होता है जो इस प्रोफेशन को अन्य प्रोफेशन से अलग करता है। दूसरे प्रोफेशन में भी आप सेवा कर सकते हैं और बदले में ढेर सारे पैसे भी कमा सकते हैं लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सक को जो आदर-सम्मान मिलता है वह कम पेशों में होता है।

आपने दिल्ली के अलावा मुंबई में भी काम किया है। आप सर्जन की नजर से दोनों महानगरों में क्या फर्क महसूस करते हैं।?
मुझे लगता है कि सर्जरी के क्षेत्र के मामले में मुम्बई दिल्ली और अन्य शहरों से काफी अच्छी है। इसलिए ही मैं मुम्बई गया जहां मुझे स्पाइन सर्जन डा. समीर दलवी से सीखने का सौभाग्य हासिल हुआ।

आपको चिकित्सक के तौर पर किन लोगों ने सबसे अधिक प्रभावित और प्रेरित किया।?
दो चिकित्सकों ने मुझे काफी प्रभावित किया। पहले, श्री चितरंजन रानावत, जो अमरीका में आर्थोपेडिक्स हैं और दूसरा, डा. नरेश त्रेहन जो कॉर्डियोलॉजिस्ट हैं और जो 20 साल पहले ही कार्डियोलॉजी में पूरी तरह से प्रशिक्षित हो चुके थे। उन्होंने ज्ञान और प्रशिक्षण के मामले में अन्य चिकित्सकों से अपने को आगे रखा। मेरा मानना है कि अगर आप चीजों को एडवांस में सीखेंगे तभी आप बेहतर ढंग से सर्वाइव कर सकते हैं।

dr yuvraj 3आपने अनेक मरीजों का इलाज किया होगा, लेकिन कोई ऐसे मरीज का इलाज किया हो जो आपके जीवन के लिये न भूलने वाला वाक्या बन गया हो?
मैंने एक ऐसे रोगी का इलाज किया जिसके पूरे पैर में फ्रैक्चर था। उसी दौरान मैंने जाना कि उसकी पत्नी को आर्थराइटिस है। मैंने उसे अपने पास लाने को कहा। मैंने उसके एक पैर का घुटना प्रत्यारोपण किया। उसके बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी और उसने मुझे आशीर्वाद दिया। उसका नाम भूरी बेगम है। घुटना प्रत्यारोपण के अगले दिन मैंने उसे चलाया और चार दिन के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी। उसके बाद मैंने एक महिला का घुटना प्रत्यारोपण किया। अभी एक महीना पहले एक अन्य रोगी का मैंने बाईलेटलर नी रिप्लेसमेंट किया। वह फरीदाबाद का फर्नीचर व्यवसायी है। वह दिल्ली में गंगाराम अस्पताल में डा. सूरज भान, अपोलो अस्पताल में डा. नागी और हर जगह से लौटकर मेरे पास आया और कहा कि मैं आपसे ऑपरेशन कराना चाहता हूं। इसका कारण यह था कि दो साल पहले मैं उसके दूकान में डायनिंग टेबल खरीदने गया था और उसने मुझे अपने घुटने का दर्द दिखाया और मुझसे पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए? मैंने उससे कहा कि यह हल्का है जब इसमें तेज दर्द हो तो मेरे पास आना। वह मेरे पास एक और कारण से भी आया क्योंकि जब समान गुणवत्ता और सुविधाओं वाला अस्पताल उनके शहर में ही है तो फिर वे कहीं और क्यों जाएं। मैंने यह ऑपरेशन बिना रक्त चढ़ाये किया और यह दर्दरहित ऑपरेशन था और मैंने उसे अगले दिन ही डिस्चार्ज कर दिया। वह मेरा इतना आभारी है कि वह रोजाना मुझे फोन करता है। उसका नाम रमेश चावला है। उसके बाद मैंने एक गरीब रोगी का इलाज किया और वह भी ठीक है।
आपने चिकित्सा के क्षेत्र में वैसे समय में प्रवेश किया जब समाज में चिकित्सकों पर से विश्वास कम हो गया है। एक समय था जब डॉक्टर को ईश्वर माना जाता था, उन्हें आदर दिया जाता था लेकिन अब इस प्रवृत्ति में कमी आयी है। लोग सोचते हैं कि डॉक्टर मनी माइंडेड होते हैं और चिकित्सक का पेशा पैसा बनाने वाला व्यवसाय है। डॉक्टर को अपना विश्वास बनाये रखने के लिए क्या करना चाहिए ताकि लोग उन्हें मनी माइंडेड न समझें?
एक समय था जब रोगी डॉक्टर के पास मिठाइयां लेकर आते थे और अब डॉक्टर रोगी के पास मिठाइयां लेकर जाते हैं। इसके कई कारण हैं। इसका सबसे बड़ा कारण विष्वास की कमी है। पूरा समाज बदल गया है। रोगी में जागरूकता बढ़ गयी है। मीडिया की भूमिका भी बढ़ गयी है। हेल्थ सेक्टर का निजीकरण भी इसका एक कारण है क्योंकि कई कारपोरेट समूह इस सेवा में आ गये हैं। प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गयी है। इन सबका इस पेशे पर गहरा प्रभाव पड़ा। कारपोरेट समूह अस्पतालों के निर्माण में करोड़ों रुपये का निवेश कर रहे हैं और इसे एक बड़े व्यवसाय का रूप दे रहे हैं। वे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से रोगियों से इलाज के लिए पैसे लेते हैं। ये अस्पताल काफी महंगे होते हैं और इसलिए लोग सोचते हैं कि अस्पताल और डॉक्टर मनी माइंडेड होते हैं। इसलिए पिछले कुछ दशकों में डॉक्टर के प्रति विश्वास में कमी आयी है क्योंकि इस कारपोरेटिजेशन के कारण, कुछ अस्पताल और डॉक्टर सिर्फ पैसा बनाने की सोचते हैं। वे इस पर अनावश्क निवेश करते हैं और छोटी समस्या के लिए भी ऑपरेशन कर देते हैं जिसे सामान्य सर्जरी से भी ठीक किया जा सकता है। वे पैसा बनाने के लिए कई अनावश्ष्यक जांच भी करा देते हैं और रोगी को कई दिनों तक अस्पताल में रख लेते हैं जिससे रोगी का डॉक्टर पर विश्वास कम हो जाता है और वे सोचते हैं कि अस्पताल जाने पर हमारे पैसे बर्बाद होंगे। मैं यह सोचता हूं और संदेश देना चाहता हूं कि हमें पहले रोगी का इलाज करना है और यही हमारा काम है। रोगी को संतुष्ट करना हमारा काम है। इसके अलावा रोगी को दवा या ऑपरेशन के फायदे-नुकसान दोनों से अवगत कराना चाहिए। जब रोगी को सभी बातें समझ में आ जायेगी तब रोगी को कोई समस्या नहीं होगी। यदि रोगी की उम्र 50 साल की है और उसे आर्थराइटिस जैसी कोई बीमारी है और उसे सर्जरी की कोई जरूरत नहीं है तो उसे बता देना चाहिए कि आपको सर्जरी की कोई जरूरत नहीं है, आप व्यायाम करें और अपनी दिनचर्या को ठीक रखें। यदि भविश्य में कोई समस्या होती है तो आप मेरे पास आना और तब हम इसकी सर्जरी करेंगे। इससे रोगी के मन में डॉक्टर के प्रति विश्वास पैदा होगा और उसका डर खत्म होगा।
आपका डॉक्टर के रूप में या और किसी रूप में कोई आदर्श है?
यदि हम चिकित्सा जगत को छोड़ दें तो मेरे भाई मेरे आदर्ष हैं। उन्होंने खराब परिस्थितियों में परिवार का पालन-पोशण किया इसलिए वे मेरे आदर्ष हैं। उन्होंने कुर्सी-टेबल के व्यवसाय से षुरू किया और अभी उनके पास 800 से अधिक कर्मचारी हैं। वह काम के प्रति बहुत समर्पित हैं, कड़ी मेहनत करने वाले हैं और अपनी बात पर अडिग रहने वाले हैं। वह जो भी वादा करते हैं वह निभाते हैं। डॉक्टर के रूप में समीर दलवी मेरे आदर्ष हैं जिनके साथ मैंने मुम्बई में काम किया। वह पूरी तरह से अव्यवसायिक हैं, वह किसी भी तरह के फर्मास्यूटिकल, किसी डॉक्टर या किसी भी चीज से सम्बद्ध नहीं हैं। उनका ध्यान सिर्फ रोगियों पर रहता है।
आपका सपना क्या है और आप क्या बनना चाहते हैं?
हमारे समाज में कई लोग आर्थराइटिस से पीड़ित हैं और वे कई कारणों से इलाज नहीं करा पाते हैं। सबसे बड़ा कारण तो पैसा है, दूसरा डर, तीसरा जागरुकता की कमी और चौथा वे जानते नहीं हैं कि उन्हें कहां इलाज कराना है। जो रोगी षारीरिक रूप से ठीक हैं और उनका रहन-सहन अच्छा है और आर्थराइटिस का इलाज कराना चाहते हैं तो हम इस विधि से उनका इलाज करते हैं। मेरा सपना आर्थराइटिस के सभी रोगियों का इलाज करना है जिसे मैं कर सकता है। इसके लिए मुझे एनजीओ की सहायता लेनी पड़ेगी जो इसके लिए आर्थिक मदद करेगी और अस्पताल मुफ्त में इलाज करेगा। मैं अपने रोगियों के प्रति पूरी तरह से समर्पित होना चाहता हूं और उन्हें पूरी सुविधाएं देना चाहता हूं।

dr, yuvraj 4डा. युवराज कुमार का परिचय

डा. युवराज कुमार फरीदाबाद के एशियन इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एआईएमएस) में वरिष्ठ आर्थोपेडिक्स सर्जन तथा विभागाध्यक्ष हैं। वह इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल से भी जुड़े हुये हैं। उन्होंने पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा विज्ञान में स्नात्तकोत्तर तथा पटना के ही बिहार मेडिकल कॉलेज एंड हास्पीटल (बीएमसीएच) से सर्जरी में मास्टर की उपाधि हासिल की। उन्होंने मुंबई के बाम्बे हास्पीटल में काम किया। लंदन के रॉयल नेषनल आर्थोपेडिक हॉस्पिटल स्टैमन और रसेलस्क्वायर में जीओएसएच ग्रिड ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल से फेलोशिप किया।

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