मुंबई का जज्बा है जो मुंबई को डूबने नहीं देता : मयंक सक्सेना

mumbai-rainsमुंबई की स्पिरिट यह नहीं है कि वह डूब जाने के अगले दिन फिर से भाग रही होती है…या फिर पानी में हो कर भी काम पर जा रही होती है…क्योंकि वह ऐसे किसी भी शहर की मजबूरी है, जहां मकान का किराया, आपकी आय (हर आय वर्ग) का 25 फीसदी हो…अस्पताल प्राइवेट ही ज़्यादा हों…और 55 फीसदी आबादी झुग्गियों में हो और ज़्यादातर लोग रोज़ कमाकर खाने वाले हों…
हां, मुंबई की स्पिरिट कुछ और है…जज़्बा…यह कमाल का लफ़्ज़ है, जो मुंबई की बात होते ही और कमाल का हो जाता है…मुंबई में 2005 की बाढ़ का मौका हो…या लोकल में धमाके हुए हों…मुंबई में न जाने कहां से और वो कौन से इतने सारे लोग हैं, जो सड़कों पर निकल आते हैं…पानी में, रेल में, स्टेशन्स पर, ट्रैफिक में फंसे लोगों को खाना और पानी बांटने लगते हैं…और नहीं, ये आम दिनों में या गणपति उत्सव या ईद के दौरान लोगों को खाना बांटने वाले लोग नहीं हैं…ये शिवसेना या बीजेपी या कांग्रेस का एनसीपी के लोग नहीं हैं…इनमें से कई खुद कामगार हैं…अपने बच्चों की फीस तक समय पर नहीं दे पाते..किसी के घर में बीमार और बुज़ुर्ग हैं…किसी की सैलरी इस महीने कट कर आई है…लेकिन इनके हाथ में पानी, बिस्किट या फिर पूरा खाना हो सकता है…मुश्किल में फंसे लोगों के लिए…

न जाने कहां से ढेरों मंदिर, मस्जिदें, चर्च और गुरुद्वारे लोगों के लिए रहने और खाने का इंतज़ाम कर देते हैं…और मज़हब पूछते भी नहीं…दफ्तरों में फंसे लोगों के लिए एक पारसी आंटी चाय लेकर पहुंच जाती हैं…एक मारवाड़ी दुकानदार, जिसे आसपास के लोग कंजूस कहते हैं, वह अस्पताल जा कर बीमारों के परिजनों को खाना पहुंचाने लगता है…मेडिकल स्टोर, ऐसे हालात में भरे हुए पानी के बीच, लोगों के घर चाय पहुंचा रहे होते हैं…सारे अनजान लोग, अपनी महंगी गाड़ियों में भीगे हुए लोगों को लिफ्ट दे रहे होते हैं…आप यकीन नहीं कर सकते हैं कि मुंबई जैसा कोई शहर होगा, जो इस तरह के हालात में ऐसा दिख रहा हो…
लोग सोशल मीडिया से व्हॉट्सएप तक आस-पास के इलाकों में फंसे हुए लोगों के लिए अपने घरों के दरवाज़े खोल देते हैं…लोग लोकल स्टेशनों पर जाकर लोगों का खाना और पानी बांट रहे होते हैं…सड़क पर छाती तक भरे पानी के बीच कोई अनजान शख्स, एक बांस पकड़ कर खड़ा होते है, जिस पर एक कपड़ा झंडी की तरह फहरा देता है, और आते जाते हर शख्स को सावधान कर रहा होता है कि यहां एक मेनहोल खुला हुआ है…और ऐसा वह तब तक करता है, जब तक कि पानी उतर नहीं जाता…
महिलाओं को लोग छाता दे देते हैं और खुद भीगते हुए रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं…एक दुकान के नीचे खड़े परिवार की गोद के बच्चों को अनजान बूढ़ा आदमी अपने घर से दूध लाकर दे जाता है…
एक लॉरी या ट्रक में पीछे 100 से अधिक लोग लद कर अपने घर जा रहे होते हैं…जिसमें कोई किसी एमएनसी का सीईओ तो कोई दिहाड़ी मजदूर होता है…मुंबई की खासियत यह है कि यह लगातार सीखती है…इसने 92 से जो सबक सीखा, उसे आज तक अपनाए हुए है…इसलिए अब कोई भाजपा या शिवसेना इस शहर में दंगे भड़काने की बात नहीं करती है…इसलिए कुछ भी हो, यहां दंगा-फसाद अब नहीं होता है…मुंबई अपनी गलतियों से सीखती है…हां, बीएमसी और मुंबई इसीलिए अलग हैं…क्योंकि मुंबई अपनी गलतियों से सीखती है…
मैं हमेशा कहता आया हूं कि कोई शहर, उसकी सड़कें, इमारतें, नहरें, गुम्बद नहीं होते….शहर होते हैं उसके लोग…मुंबई बीएमसी नहीं है, गेटवे ऑफ इंडिया, मरीन ड्राइव या जुहू बीच या धारावी नहीं है…मुंबई दरअसल उसके लोग हैं…इस शहर के हर आदमी के अंदर मुंबई बसी है…दरअसल मुंबई से प्यार किए बिना आप यहां नहीं रह सकते…क्योंकि ऐसा होना नामुमकिन है कि आपको इस शहर से प्यार न हो…जब कोई आपको छाती तक पानी में फंसा देख कर ये बोले कि चल न भाऊ अब…देखा जाएंगा…यहां तो ये सब होताइच्च रहेगा…घबराने का नई…और आप उसकी ओर मुड़कर देखें तो वह एक ईसाई औरत हो…जो आगे आपसे कहे कि जीसस पर भरोसा रखने का…तो वह आपसे कह रही होती है कि मुंबई में आपको मुंबईकर पर भरोसा रखना होगा…जीसस कहीं और नहीं…वहीं हैं जहां कोई और ईश्वर होगा…मुंबई आपको नास्तिक बनाता है, क्योंकि वह आपको इंसानियत पर भरोसा रखना सिखाता है…मुंबई आपको आस्तिक बनाता है, क्योंकि वह इंसान में ईश्वर से मिलवा देता है…
पिछले दो दिन, हमने फिर इस शहर को महसूस किया…आप जो टीवी पर देखते रहे हों…कि कोई हिंदी बनाम मराठी के नाम पर गा़ड़ियां तोड़ रहा हो…मैं तमाम शहरों में रहा हूं…मराठियों जैसे मददगार लोग, मैंने कम देखे…मुंबई की सड़कों पर पारसी, मराठी, टेढ़ी-मेढ़ी उर्दू, कोंकणी, गुजराती, मारवाड़ी, मलयाली और तमिल आवाज़ें गूंज रही थी…हिंदी के साथ मिल कर वो इतनी देसी हो जाती हैं, कि उनको सुनना हिंदुस्तान से गुज़रना होता है…
हां, अगले दिन से मुंबई फिर वैसी ही है…किसी साधारण हिदुस्तानी संयुक्त परिवार की सुबह की तरह, जहां सुबह घर में किसी को दफ्तर जाना है…किसी को स्कूल तो किसी को कसरत करने…सबको उस वक्त सिर्फ अपने वक्त की फिक्र है…और सब पहले अपने बारे में सोच रहे हैं…लेकिन मुश्किल के वक्त में वही मुंबई एक परिवार है…पहले एक दूसरे के बारे में सोचने वाला…सुनिए मुंबई को किसी एक नज़रिए से मत देखिए…कम से कम टीवी चैनलों के नज़रिए से नहीं…आप बहुत कुछ सीख पाएंगे
मुंबई, मुझे तुमसे प्यार है…और जल्द ही अल्फ़ाज़ में मराठी में कहना सीख लूंगा..
मयंक सक्सेना के फेसबुक बॉल से सभार

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